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India Diary

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#751 [Permalink] Posted on 5th June 2020 09:26
ssaad wrote:
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Hey I never said kill your hindu neighbours if that's what your implying.
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#752 [Permalink] Posted on 7th June 2020 07:23
Arundhati Roy on Covid in India

Quote:

"The moment they open their mouth, they are attacked viciously. Being trolled, threatened and all of that is one part. The attack is merciless. So there is so much fear," she said.


Quote:
She accused the government of doing nothing for two months after the first case was reported on January 30 because "it had other things to do" like dealing with massive protests against the controversial Citizenship Amendment Act that culminated in an anti-Muslim riots in North East Delhi.


Source : DH
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#753 [Permalink] Posted on 7th June 2020 17:00
नरेंद्र मोदी से मेरा मोहभंग क्यों हो गया…Google Translation Follows

➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖
अनुमा आचार्य

मैं नरेंद्र मोदी से प्रभावित थी, गुजरात में रहते हुए मैंने अच्छी सड़कें, छोटे उद्योग देखे थे, उनकी तारीफ़ भी सुनी थी. राजनीति में जाने का सोचने के बाद मैंने भाजपा से संपर्क भी किया और पार्टी के लिए काम भी किया. लेकिन बीते कुछ सालों में हुईं कई घटनाओं ने प्रधानमंत्री मोदी के बारे में मेरी राय बदलकर रख दी.

एक ट्वीट का अचानक वायरल हो जाना जीवन में बहुत कुछ बदल सकता है, जैसा मेरे साथ हुआ और ट्वीट भी किस पर! देश के प्रधानमंत्री पर.

‘असली विंग कमांडर हैं? वायुसेना ने निकाल दिया है, इन जैसे लोग सेना में जाते कैसे हैं’ से शुरू कर के ट्रोल गैंग की बेशुमार गालियों से पहली बार सामना हुआ.

ये कहानी शुरू हुई थी पंद्रह साल की नौकरी के बाद वायुसेना की हम पहली कुछ महिला अधिकारियों की पेंशन की ऐसी लड़ाई में जीत से, जो देश में सेना के इतिहास में पहली बार जीती गई थी. जो मिला वह अभूतपूर्व था तो सोचा कि ईश्वर ने सुरक्षित जीवन जब दे ही दिया है तो समाज को कुछ वापस करना चाहिए.

चूंकि मैंने अपने माता-पिता को अपनी उम्र के इक्कीसवें साल में खो दिया था, इसलिए अपने गृहनगर विदिशा के विकास और आधुनिकीकरण के लिए कुछ कर दिखाने का और इस तरह माता-पिता को श्रद्धांजलि देने का मन बना लिया.

इरादा था कि पेंशन मिलते ही वायुसेना की नौकरी छोड़ कर विदिशा के लिए समर्पण से काम करूंगी. जानती थी कि अगर राजनीतिक मंच मिला, तो विदिशा को आधुनिकता के अलग मुकाम तक ले जाया जा सकता है. वायुसेना में मिली काम के प्रति प्रतिबद्धता की उपलब्धियों और पुरस्कारों से आत्मविश्वास भी बढ़ा हुआ था.

तो इसी पक्के इरादे के साथ समय से 9 वर्ष पूर्व स्वैछिक सेवानिवृत्ति का आवेदन डालने के साथ-साथ मैंने राजनीतिक पार्टियों को अपने प्रोफाइल के साथ ईमेल लिखे. राजनीति से मेरा ताल्लुक अब तक एक सामान्य व्यक्ति जितना ही था.

जहां एक तरफ मैं श्रीमती इंदिरा गांधी से बचपन से प्रभावित थी, वहीं दूसरी तरफ मैं नरेंद्र मोदी से प्रभावित थी क्योंकि वर्ष 2009 में गुजरात प्रवास के दौरान अच्छी सड़कें और छोटे उद्योग देखे थे और लोगों से तारीफ भी सुनी थी.

2014 में उनकी शानदार जीत से बड़ी उम्मीदें भी जगी थीं. मैंने खोज-परख कर कांग्रेस पार्टी के एक सचिव और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) को ईमेल लिखा. मुझे प्रधानमंत्री के तत्कालीन पीआरओ से तुरंत जवाब मिला.

उन्होंने पहले मुझसे एक विस्तृत मुलाकात की और फिर आगे चलकर प्रधानमंत्री से भी मिलवाया. देश के प्रधानमंत्री से उनके दफ्तर में मिलने की खुशी ने मुझे सातवें आसमान पर पहुंचा दिया था और मुझे लगा था कि आगे चलकर मैं विदिशा के लिए जरूर कुछ कर सकूंगी.

प्रधानमंत्री ने मुझे गुजरात चुनाव के दौरान ग्राउंड वर्क करने और सीखने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि उनके दफ्तर से मुझे समय पर संपर्क किया जाएगा, जो हुआ और मैं सब संशयों को हटाकर प्रधानमंत्री की कायल हो गई.

गुजरात के भाजपा मुख्यालय ‘कमलम’ में सब कुछ बहुत व्यवस्थित था और अनुशासित भी, लेकिन तीसरे ही दिन मैंने महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं के बारे में नोटिस किया कि उन्हें रणनीतिक रूप से नहीं, सिर्फ सजावटी रूप में स्थान मिलता है. यह भाजपा में महिलाओं के प्रचारित स्तर से मेल ही नहीं खाता था.

कुछ और दिनों के बाद दिखने लगा कि लगभग सभी महिला सदस्य पार्टी में अपने रोल और स्थान से नाखुश तो हैं, लेकिन अपनी बात स्वतंत्र रूप से रख भी नहीं सकतीं.

पहले मैंने बहुत ध्यान नहीं दिया, लेकिन बाद में धीरे-धीरे उन्होंने अपनी निराशाओं के बारे में मुझे अलग-अलग समय में बताया, तो मुझे भी माहौल पुरुषकेंद्रित और दमघोंटू लगने लगा, इसलिए अनुरोध करके मैंने खुद को महिला टीम से अलग कर लिया, जिससे वैसी निराशा का मुझ पर असर न हो. लेकिन असर तो होने लगा था…

नवंबर और दिसंबर 2017 में कुल 45 दिन मैं गुजरात में भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ रही. मुख्यतः मैंने भाजपा के कॉल सेंटर की टीम को ऊर्जावान और लक्ष्य पर बनाए रखा. इसके अलावा मैंने महिला मोर्चे के साथ सूरत और भावनगर की यात्राएं की थीं.

मेरे जिम्मे आठ लाख उज्वला लाभार्थियों को आठ दिनों के अंदर प्रधानमंत्री द्वारा लिखे पत्रों को सही पते पर प्रेषित करवाने का काम भी था. मैंने भाजपा के मुख्यालय में उनकी टीम के साथ काम तो किया लेकिन उस दौरान भी भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता नहीं ली और न ही किसी ने मुझसे इस बारे में बात की. मेरे बारे में लोग यही कहते थे कि मैं पीएमओ से आई हूं.

गुजरात चुनाव में भाजपा को वांछित जीत नहीं मिली. मैं भी दिल में अनिर्णय लिए दिल्ली लौट आई. अपने कामों की विस्तृत रिपोर्ट बनाकर अमित शाह को दे दी. उन्होंने मेरे किए गए कामों की प्रशंसा की और कहा वे मुझे कुछ समय बाद सूचित करेंगे, जो कभी नहीं हुआ.

बहरहाल, मैंने विदिशा का रास्ता पकड़ा और हर माह 15-20 दिन वहां रहकर स्कूलों में मोटिवेशनल स्पीच, सेमिनार, डिबेट्स और करिअर गाइडेंस करते हुए शहर में अपना स्थान बनाना शुरू किया.

इस बीच बहुत-सी घटनाएं होती रहीं और मुझे लगने लगा कि प्रधानमंत्री कुछ खास प्रभावी नहीं दिख रहे थे. पर मेरे मोहभंग की शुरुआत कठुआ की घटना पर प्रधानमंत्री की लंबी चुप्पी से हुई. मैंने ट्विटर पर उन्हें टैग करते हुए इस नृशंस घटना पर कार्रवाई के लिए गुजारिशें भी कीं, लेकिन प्रधानमंत्री ने दो माह बाद जब कुछ बोला, तो उसकी कीमत ही नहीं रही थी.

उस घटना से भाजपा का चेहरा अलग दिखाने लगा था. फिर मेरा ध्यान प्रधानमंत्री की भाषा और भावों पर भी जाने लगा. जब वे दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्रियों को अनवरत अपशब्द कहते थे तो लगता था कि वे इतने शक्तिशाली होने पर भी इतने परेशान क्यों हैं कि मृत लोगों पर भी हिकारत बरसा रहे हैं.

अवसर कोई भी हो, मुद्दा कहीं का भी हो, वे हमेशा सत्तर सालों की नाकामयाबी पर ही बात करते थे. ये सिलसिला फिर जारी ही रहा. मॉब लिंचिंग और उनका सही ठहराया जाना, सरकार के गलत कामों का प्रोपोगैंडा द्वारा प्रभावी बताने का प्रचार, आधे सच से शुरू पूरे झूठ पर खत्म होने वाली वॉट्सऐप की लाखों पोस्ट्स का प्रचार, कट्टरता को हिंदू धर्म बताने का प्रचार, जिसके कारण गुंडा तत्व भी निडर होने लगे.

महिलाओं से संबंधित हर अपराध को हल्के लेने का क्रम भी शुरू हो गया था. इसी दौरान जब मध्य प्रदेश में चुनाव घोषित हो गए, तो शायद विदिशा शहर में खुद के बल पर बनती जा रही मेरी पहचान के मद्देनजर अचानक ही भाजपा ने मुझे विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में राज्य कार्यकारिणी में लेने की घोषणा समाचार पत्रों में दे दी.

मैं इस औचक प्रस्ताव के लिए तैयार नहीं थी. ये सच है कि मैं राजनीति में ही आना चाहती थी, लेकिन वह वक्त पहले खुद की पहचान बनाने का था. भाजपा के इस प्रस्ताव ने मुझे गुजरात में मिलीं उन सभी महिला नेताओं और कार्यकर्ताओं की याद ताजा करा दी, जिन्हें पार्टी अनुशासन के नाम पर न कुछ बोलने की स्वतंत्रता थी और न कुछ करने की.

मुझे लगा कि मैं भी वैसी ही बंधुआ हो जाऊंगी और उसी छटपटाहट के दौरान जब मुझे एक पत्रकार ने बधाई दे डाली, मैंने स्पष्ट कहा कि मैंने भाजपा से ये नहीं मांगा था, मैं भाजपा में नहीं शामिल हो रही हूं. इस मोड़ पर भाजपा से मेरा मोह तो टूटा ही था, भाजपा का ये भ्रम भी साथ-साथ ही टूट गया कि लोग उनसे जुड़ने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार होते हैं.

इस अनचाही स्थिति से उबरना मुझे नहीं आता था. लेकिन तभी मध्य प्रदेश में आम आदमी पार्टी (आप) के अध्यक्ष ने मुझे विदिशा से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया और कहा कि अपने लक्ष्य की ओर जरूर चलना चाहिए और लोगों को भी ईमानदार नेतृत्व की जरूरत है.

दिल्ली सरकार के रूप में आप से मैं प्रभावित तो थी ही, उसी आधार पर पार्टी के नामी नेताओं से मिलने के बाद मैंने उनका प्रस्ताव मान लिया. मैं जानती थी कि चुनाव तो नहीं जीत सकूंगी क्योंकि न तो पार्टी का कोई मजबूत संगठन है और न ही प्रचार के पैसे.

सिर्फ हिम्मत और भरोसे पर चुनाव लड़ा कि शायद मेरी साफ नीयत को पसंद करने वाले लोग आगे आएंगे. चुनाव अभियान में जिस शिद्दत से मैंने मेहनत की, उसे पहचान मिली और मध्य प्रदेश के योग्य और ओजस्वी प्रत्याशियों के रूप में मेरा नाम लिया गया.

चुनाव की इस पूरी प्रक्रिया में आप का दिल्ली का शीर्ष नेतृत्व वैसे ही गायब था, जैसे सिपाहियों की टुकड़ी को दुश्मन के मुंह में पहुंचाकर कमांडर गायब हो जाए. चुनाव की मेहनत ने तो नहीं, लेकिन शीर्ष नेतृत्व की इस फितरत ने मेरे हौसले पस्त कर दिए.

चुनाव के दो महीनों बाद भी उमंगहीन ही बनी रही पार्टी से मैंने फरवरी 2019 में इस्तीफा दिया और अनगिनत बुरे अनुभवों की इस मारक चोट को भरने के लिए दिल्ली आ गई. दिल्ली में एक नए राष्ट्रीय हिंदी समाचार चैनल में हिंदी की सलाहकार एंकर बनने का प्रस्ताव था, मैंने राजनीति में जाने के मूल लक्ष्य की ओर लौटने से पहले इसे एक ब्रेक की तरह लिया.

इस टीवी चैनल के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री आए. उद्घाटन वाले दिन ही प्रधानमंत्री और चैनल के फाउंडर सीईओ के बीच बातचीत के एक वीडियो के वायरल हो जाने से उस टीम के बुरे दिन शुरू हो गए. फिर भी मेरा प्रधानमंत्री से पूरा मोहभंग होना अभी भी बाकी था, जो इसी वक्त शुरू हुआ.

पुलवामा आतंकी हमला, बालाकोट एयरस्ट्राइक, विंग कमांडर अभिनंदन से जुडी घटनाएं, सेना का राजनीति में भरपूर इस्तेमाल, विद्वान, लेखकों और पूर्व सेना अधिकारियों द्वारा प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी पर प्रोपोगैंडा से चिट्ठी लिखने वालों की ही सार्वजनिक निंदा, प्रधानमंत्री की चुनावी भाषा का ओछा होते चले जाना और फिर प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से सांसद प्रत्याशी बनाना…

इस सबसे मुझे समझ में आ गया था कि प्रधानमंत्री में देश के प्रति समर्पण जैसा कुछ भी अनोखा नहीं हैं, वे भी अन्य राजनीतिक नेताओं की तरह या शायद उनसे भी ज्यादा आडंबरपूर्ण और अहंकारी हैं. उनकी हर कथनी और करनी में अंतर बढ़ता ही गया.

मैंने यह भी महसूस किया कि प्रधानमंत्री आत्मकेंद्रित हैं. उन्हें अपनी टीम के कार्यकर्ताओं को पैसों से शक्तिमान बनाना तो आता है लेकिन टीम के मंत्रियों को शक्तिसंपन्न नहीं करते हैं. यही कारण है कि कैबिनेट के तीन-चार मंत्रियों के अलावा न कोई जनता से सरोकार रखता है और न ही संवेदनशील है.

अधिकांश मंत्रियों की जनसामान्य से सहानुभूति या संपर्क नहीं है. अर्थव्यवस्था वेंटिलेटर पर, लेकिन आयोजनों में फिजूलखर्ची बहुत होने लगी है. अब तक मैंने समझ लिया था कि प्रधानमंत्री और उनकी टीम देश को सुचारू रूप से या औसत रूप से भी चलाने में अक्षम हैं.

वे बहुत से मौके तलाश करके उत्सव और समारोह से लोगों को भरमाते हैं लेकिन असल समस्या को नहीं सुलझा पाते. जिस भाजपा आईटी सेल से प्रोपोगैंडा चलाया जाता है, उसे उनका खास आशीर्वाद प्राप्त है.

कोरोना महामारी के समय उनकी असंवेदनशीलता और भी मुखर हो कर सामने आई. इसी दौरान प्रधानमंत्री के वरदहस्त तले मीडिया का अनथक हिंदू मुस्लिम एजेंडा चलता रहा. कई निर्दोष बिना पुख्ता सबूतों के गिरफ्तार किए गए और उनका या तो भविष्य खत्म हो गया या अंधकार के हवाले कर दिया गया.

कोरोना योद्धाओं के सम्मान के नाम पर अजब-गजब काम किए गए और जो पैसा मजदूरों के काम आ सकता था, उसे आडंबरों पर खर्च करवा दिया. कोरोना काल ने इन सभी बातों ने इकठ्ठा हो कर मेरी आस्था पर आखिरी चोट का काम किया.

इसी का नतीजा था- मेरा वह ट्वीट, जो अचानक वायरल हो गया और अच्छे उद्देश्य को लेकर शुरू हुई मेरी अब तक की ‘मोदी-मोह से मोहभंग’ की कहानी भी सबके सामने आ गई.

(अनुमा आचार्य भारतीय वायुसेना के पहले महिला लॉजिस्टिक्स बैच की रिटायर्ड विंग कमांडर हैं.)

Rajesh Rajesh जी की वॉल से

Why I became disillusioned with Narendra Modi
➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖➖
Anuma Acharya

I was impressed by Narendra Modi, while living in Gujarat I saw good roads, small industries, I also heard his praise. After thinking of going into politics, I also contacted the BJP and worked for the party. But many incidents in the last few years have changed my opinion about Prime Minister Modi.

The sudden virality of a tweet can change a lot in life, as it happened to me and the tweet on whom! On the Prime Minister of the country.

‘Real Wing Commander? The Air Force has fired, how do people like these go to the army, starting with the countless abuses of the troll gang for the first time.

The story began with the victory of the first few female officers of the Air Force after fifteen years of service in a battle for pensions, which was won for the first time in the history of the Army in the country. What he got was unprecedented, so he thought that once God has given him a safe life, society should give something back.

Since I lost my parents at the age of 21, I made up my mind to do something for the development and modernization of my hometown Vidisha and thus pay homage to my parents.

The intention was that as soon as I got my pension, I would quit my job in the Air Force and work with dedication for Vidisha. She knew that if a political platform was found, Vidisha could be taken to a different stage of modernity. Confidence was also boosted by the achievements and rewards of commitment to work in the Air Force.

So with this firm intention, along with filing the application for voluntary retirement 9 years ahead of time, I also wrote emails to political parties with my profile. Until now, my involvement in politics was the same as that of a normal person.

While on one hand I was impressed by Mrs. Indira Gandhi from my childhood, on the other hand I was impressed by Narendra Modi because during my stay in Gujarat in the year 2009 I saw good roads and small industries and also heard compliments from people.

His stunning victory in 2014 also raised high hopes. I researched and wrote an email to a Secretary of the Congress Party and the Public Relations Officer (PRO) of the Prime Minister's Office (PMO). I got an immediate reply from the then PRO of the Prime Minister.

He first had a detailed meeting with me and then later introduced me to the Prime Minister. The joy of meeting the Prime Minister of the country in his office had taken me to the seventh heaven and I felt that in the future I would definitely be able to do something for Vidisha.

The Prime Minister advised me to do ground work and learn during the Gujarat elections. He said that I would be contacted from his office in time, which happened and I was convinced of the Prime Minister by removing all doubts.

Everything was very organized and disciplined at the BJP headquarters in Gujarat, Kamalam, but on the third day I noticed women leaders and activists finding a place not just strategically, but decoratively. This did not match the level of promotion of women in the BJP.

After a few more days, it became apparent that almost all the women members were unhappy with their role and place in the party, but could not speak freely.

At first I didn't pay much attention, but later they gradually told me about their frustrations at different times, so I also started feeling male-centered and suffocating, so by requesting I separated myself from the women's team, So that such frustration does not affect me. But the effect was beginning to happen.

In November and December 2017, I stayed with BJP workers in Gujarat for a total of 45 days. Mainly I kept the BJP's call center team energetic and on target. Apart from this I had traveled to Surat and Bhavnagar with Mahila Morcha.

I also had the task of getting the letters written by the Prime Minister sent to the correct address to the eight lakh bright beneficiaries within eight days. I worked with his team at the BJP headquarters but even then I did not join the Bharatiya Janata Party and no one talked to me about it. People used to say about me that I came from PMO.

The BJP did not get the desired victory in the Gujarat elections. I also returned to Delhi for indecision in my heart. Made a detailed report of his works and gave it to Amit Shah. He praised my work and said he would inform me later, which never happened.

However, I took the road to Vidisha and started making my place in the city by staying there for 15-20 days every month, doing motivational speeches, seminars, debates and career guidance in schools.

There were a lot of incidents in the meantime and it seemed to me that the Prime Minister was not looking very effective. But my disillusionment began with the Prime Minister's long silence on the Kathua incident. I tagged him on Twitter and asked for action on this heinous incident, but when the Prime Minister said something two months later, it was worthless.

The face of BJP was starting to look different from that incident. Then my attention began to go to the language and expressions of the Prime Minister. When he used to call the late former prime ministers incessantly abusive, it seemed that even though he was so powerful, why are they so upset that they are hurting the dead.

Whatever the occasion, whatever the issue, they always talked about the failure of seventy years. This continued. Mob lynching
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#754 [Permalink] Posted on 10th June 2020 06:21
Mossad Connection of 1984


In the month of June in 1984 India conducted Operation Blue Star in the Golden Temple, the Headquarter of Sikh faith, to flush out pro-Khalistan militants lead by Sant Gernail Singh Bhindrawale.

This report from two years ago focused on the Israeli connection to that.
Quote:

The Special Group or SG commandos, as they were called those days, had been trained by an expert team of the Mossad, the Israeli intelligence organisation. The SG had been created in 1981 for special operations. The Israeli trainers were Mossad commandos who had conducted a one-of-its-kind operation to rescue hostages from Uganda's Entebbe airport in 1977.

Quote:

The Indian Army, it appears, had underestimated the strength of the armed men of Bhindranwale. They were led by a disgraced Indian Army Major General Shabeg Singh, who had been awarded Ati Vishist Seva Medal for providing training to the forces of Mukti Bahini of Bangladesh. He was later dismissed from services on various charges including corruption.
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#755 [Permalink] Posted on 29th June 2020 16:20
Would welcome your critique of this article Maripat sahib.

m.hindustantimes.com/books/excerpt-inside-the-tablighi-ja...

Excerpt: Inside the Tablighi Jamaat by Ziya Us Salam

An exclusive first excerpt from a new book on the Muslim religious organization accused of spreading Covid19 in India. Reproduced here is the preface to the book, which provides an idea of the Tablighi Jamaat’s focus
..............................................................
The author laments tablighis for remaining apolitical and not raising voice or help for the opressed but he has completely missed the purpose of tablighi jamat. Tabligh is not a full time job but only asks for 1/10 of your time or 1/3 if you are capable. Tablighis may not be involved in humanitarian work as defined by the author but what work can be bigger than saving fellow human being who is teetering towards the fire of hell. Talking of humanitarian work, jamiat and Tabligh are complementary to each other and it's members are not exclusive to one but often found in both as and when needed.
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#756 [Permalink] Posted on 29th June 2020 17:11
Rajab wrote:
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This is simply a look at the tablighi jamat from the perspective of an outsider, who happens to be a member of the Jamat e Islami. There have been other books written over the years in a similar style, one most notably by Maulana Waheeduddin Khan Sahab.
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#757 [Permalink] Posted on 29th June 2020 17:20
abuzayd2k wrote:
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I could tell he was member of jamat e Islamic from his writings way before he mentioned it in the article. But am just saying how stupid their criticism sounds. For a deobandi, jamiat and tj are sister organisations. We do not bash tj for being apolitical and remaining silent because we trust jamiat to address them issues.
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#758 [Permalink] Posted on 29th June 2020 18:13
Rajab wrote:
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This looks like just a money spinner, considering the timing. The meeting the author had at home is typical of any tashkeeli mulaqat with junior Jamat e Islami type of people and the author betrays his disdain for the common TJ worker.
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#759 [Permalink] Posted on 30th June 2020 05:32
Rajab wrote:
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Zia-ul-Islam, ya akhi began as a film critique. And my psyche gets stuck there. It is difficult for me to process the rest of the info.

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#760 [Permalink] Posted on 11th August 2020 21:03
What's happening in Bangalore? Allah ta'ala keep all Muslims safe..
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#761 [Permalink] Posted on 11th August 2020 21:21
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#762 [Permalink] Posted on 12th August 2020 12:19
bint e aisha wrote:
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"According to the sources, after Naveen posted the derogatory image on social media, a group of people visited the police station to file a complaint against him where the police allegedly asked them to talk and sort it out.

Angry over this response, the mob gathered outside the police station and started protesting against the police asking them to take immediate action."
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#763 [Permalink] Posted on 12th August 2020 12:31
Rajab wrote:
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There are some unconfirmed reports of "others/outsiders" joining the protestors and committing arson.
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#764 [Permalink] Posted on 12th August 2020 14:14
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#765 [Permalink] Posted on 12th August 2020 14:29
abuzayd2k wrote:
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Same thing had happened at azad maidan in 2012 if you remember. Same date aswell 11th August.
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