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Muslim Renaissance Personalities

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#1 [Permalink] Posted on 12th October 2017 09:33
This is not a threat about Islamic Renaissance for Islam needs neither reform nor renaissance. Islam was finalized more than fourteen centuries ago in the Arabian peninsula and that is it.

Of course I agree with late Dr Israr Ahmed that Muslims have faced ups and downs over this period of fourteen centuries but Islam has faced only decline.

In that sense we can say that we do need revival of Islam and this concept helps in clarifying many confusions in our history. For example the Muslim League movement in the first half of twentieth century India was really a Muslim movement and not an Islamic movement for it focussed on the interests of Muslims in Indian subcontinent.

Revival of islam is a different problem. This is the problem of restoring Islam to the collective life of Muslims. This is an extremely difficult problem. Not only our internal inertia but our fascination for things non-Islamic is a big hurdle in this journey and this path and this goal.

Nor is this an internal problem of Muslim Ummah for the environment we live in strongly feels entitled to meddle in this issue. In view of that Muslims have to actively and judiciously engage the other significant entities in the world in a meaningful dialogue so that we can walk on our journey to incorporate Islam into our lives.

In this thread I intend to talk about those personalities who contrinuted in the dual task of renaissance in Muslim world in the sense of taking care of the worldly affairs of Muslims.
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#2 [Permalink] Posted on 12th October 2017 09:36
I begin by adopting a Hindi Facebook post by a very talented yound 'Alim from Azamgarh Mubashshir Ahsan Al-Azizi on Shaikh Abdul Qadir Al-Jazairi. I intend to do the English summary later on.

जब यूरोपियन देशो ने मुस्लिम इलाक़ो पे चढ़ाई शुरू की तो उनका मुकाबला करने के लिये कुछ ऐसी शेर दिल शख्सियात सामने आई जिन्होने न सिर्फ़ मुसलमानो की कीयादत और उन्हे अपनी विरासत की तरफ लौटने का पैगाम दिया बल्कि अंग्रेज़ो के सामने वो चैलेंज पेश किया की खुद अँग्रेज़ उनकी बहादुरी के सामने घुटने टेक दिये तो साथ मे उनके सामने हुस्न-ए-अख़लाक़ का वो नमूना पेश किया की जो अँग्रेज़ तारीख अब तक पेश करने मे नाकाम है .

When Europe invaded Muslim lands then some brave personalities came orward to face them who not only offered leadership to Muslims but also exhorted them to return to their ancient legacy as well as offered such a resistance that the foreigners capitulated before their bravery and they presented suchan honourable character that the foreigners are unable to do till today.

जहाँ हिंदोस्तान मे अंग्रेज़ो से लोहा लेने वालो मे टीपू सुल्तान शहीद का नाम सबसे बुलंद मकाम पर है तो वही शेखुल हिंद मौलाना महमूद-अल-हसन(रह.) की ज़ात-ए-मुबारका भी है जिन्होने उस समय मुल्क की कीयादत की जब इस मुल्क मे कीयादत का आकाल पड़ गया था बल्कि शेखुल हिंद मौलाना महमूद-अल-हसन(रह.) ने मुज़ाहेदीन का वो लश्कर तय्यार कर दिया जिन्होने अंग्रेज़ो का मुकाबला आखरी दम तक किया और अंग्रेज़ो को मुल्क छोड़ने पे मजबूर किया

If Tipu Sultan Shaheed is on top of the list of those who challeged the British then at the same time there is the honourable personality of Shaikhul Hind RA who lead the country when there was a famine of leadership and raised sucha group of freedom fighter who fought till the end forced the British to leave India.

ठीक इसी तरह लीबिया मे अमीर उमर मुख़्तार शहीद(रह.) ने इटली की ज़ालिम होकूमत से मुकाबला और आज़ादी के लिये जद्द-ओ-जहद की वो मिसाल कायम की आज भी दुनिया मे ज़ालिमो के खिलाफ इन्क़िलाब मे उनके नाम-ओ-तस्वीर की तख्तियो का इस्तेमाल करना काबिल-ए-फख्र और काबिल-ए-रहनुमाई समझा जाता है

Similarly in Libya Ameer Omar Mukhtar set an example of struggle by taking on the Italian invaders that even today using his name and name plates is considered to be most honourable.

इन्ही शख्सियात मे से एक अज़ीम मुजाहिद हैं अल्जीरिया के शैख़ अब्दुल क़ादिर अल जेज़ायरी(रह.) और ये तस्वीर उन्ही की है और मैं आज इनका मुख़्तसार सा तारूफ़ पेश कर रहा हू ताकि हम अपने माज़ी की कीयादत और उनकी जुर्रत-ओ-बहादुरी को देख सके और वैसा ही शौक पैदा करे इस उम्मत की सरबुलंदी के लिये जद्द-ओ-जहद और ज़ेहनी फ़िक्र का

One of the honourable freedom fighters is the great Algerian Shaikh Abdul Qadir Al-Jaza-iri RA. Today I am presenting a brief introduction to his personality so that we realise his courage and bravery and inculcate similar enthusiasm and fervor for thought and struggle.


शैख़ अब्दुल क़ादिर 1808 मे पैदा हुये और 21 की उम्र मे हज करने मक्का गये और फिर जब वापस अल्जीरिया आये तो वहाँ1830 मे फ्रांस ने अल्जीरिया पे हमला कर वहाँ क़ब्ज़ा कर लिया था
Shaikh Abdul qadir was born in 1808 and went for Haj to Makkah at the age of 21 and at that time France attacked Algeria.
और उस समय अल्जीरिया के ठीक वही हालात थे जैसे हिंदोस्तान मे था यानी की छोटी छोटी रियासते थी जो आपस मे ही लड़ा करती थी ठीक वैसे ही अल्जीरिया मे मुसलमानो के मुख्तलीफ कबीले थे जो एक दूसरे के कट्टर दुश्मन थे और सिर्फ़ आपस मे ही लड़ा करते थे
At that time conditions in Algeria were the same in India where there were a large number of small states who fought with each other and weakened the country and the French took advantage of it.

और फ्रांस ने इसी का फ़ायदा उठा के हमला किया और फ़ौरन बेगैर किसी परेशानी के अल्जीरिया पे क़ब्ज़ा कर लिया था
and captured the country without much difficulty.

शैख़ अब्दुल क़ादिर ने सभी कबीलो को इकट्ठा किया और उनके आपसी एख्तिलाफात को ख़त्म कर उन सभी को इस बात पे आमादा कर लिया की वो सब मुत्तहीद हो कर फ्रांस के खिलाफ लड़ेंगे और उन सब ने शैख़ अब्दुल क़ादिर को अपना अमीर चुन लिया.....
Shaikh Abdul qadir called all the tribes and urged them to get united and forget the internal differences and they agrred and chose him as their Amir.

आप जानते है की उस समय उनकी उम्र क्या थी...???....जिस उम्र मे हमारे यहाँ के नौजवानो को इश्क-ओ-आशिकी के भूत सवार होते है शादी और लड़कियो के हसीन सपने आते है उस उम्र शैख़ अब्दुल क़ादिर ने पूरे अल्जीरिया को फ्रांस के खिलाफ जद्द-ओ-जहद के लिये एकजुट कर लिया था जब उन्हे फ्रांस के खिलाफ जिहाद के लिये अल्जीरिया की अवाम द्वारा अमीर चुना गया उस वक़्त उनकी उम्र सिर्फ़ 25 साल थी

And do you know his age at that time? When youth is mesmerized by worldly beauty and romance the Shaikh had united all the tribes of Algerai to raise a resistance against France - he was merely 25 years old at that time.
शैख़ अब्दुल क़ादिर ने सबसे पहले एक मस्जिद से फ्रांस के खिलाफ जिहाद का एलान कर फ्रांस की ताक़त से टकरा गये उस समय उनके पास कोई आर्थिक और न ही सैन्य मदद हासिल थी बस वो अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त के भरोसे फ्रांस से टकरा गये
He declared a fight against France fom aMosque in spite of having no resources of any kind, merely on the basis of trust in God.
और जल्द ही फ्रांस को उन्होने शिकस्त देनी शुरू की और सिर्फ़ 7 साल के अंदर अल्जीरिया के एक तिहाई से अधिक हिस्से को फ्रांस से आज़ाद करा लिया
He started defeating the French and within seven years freed one third of Algeria from France.

और जो उन्होने इलाक़ा फ़तेह किया वहाँ इस्लामिक शरीयत नाफीज़ कर उसे दारूल इस्लाम घोषित कर दिया

And he declared it Islamic country after his victory
लेकिन फ्रांस ने अपनी पूरी ताक़त वहाँ झोंक दी और बिल आख़िर ये मर्दे मुजाहिद 1849 मे जा कर गिरफ्तार हुआ और फिर उन्हे नज़रबंद कर दिया गया और फिर बाद मे इन्हे रिहा कर दिया गया
But France used her full force against him and finally this great fighter was arrested in 1849 and was house arrested but released later on.
और बाद मे ये दमिश्क(आज के सिरिया की राजधानी) चले गये और जब 1860 मे माउंट लेबनान सिविल वॉर छिड़ी और ड्रूज़ और ईसाइयो के बीच जंग छिड़ी तो इन्होने अपनी जान पर खेल कर हज़ारो ईसाइयो की जान बचाई और उन्हे पनाह दी ध्यान रहे की ड्रूज़ एक इस्लाम से खारिज फिरका है ये शियो के इस्मायली फिरके से निकले थे.......

Later on he moved to damscus and during the Druze war he samed countless Christian families getting killed and gave them protection subsequently. Druze is a sect born out of Ismaili Shia sect.
जिस शख्स के मुल्क के उपर एक ईसाई देश फ्रांस ने हमला किया और शख्स के खानदान व मुल्क को तबाह-ओ-बर्बाद कर दिया और जिनके खिलाफ उन्होने अपनी पूरी ज़िंदगी जद्द-ओ-जहद की लेकिन जब उस धर्म के लोगो पे कही ज़ुल्म हुआ तो ये शख्स चट्टान की तरह ढाल बन गया और उनकी ज़िंदगी के लिये अपनो से दुश्मनी मोल ली जिस धर्म के लोगो ने उस मर्दे मुजाहिद को अपना मुल्क छोड़ने पे मजबूर कर दिया वही शख्स दूसरे मुल्क मे जा कर उस धर्म के खिलाफ उठने वाली तलवारो को अपने सिने पे ले कर उनकी हिफ़ाज़त करता है....
This was a man who save those people fom their enemies who had invaded, captured and damaged his own country.

आज वही सिरिया है जहाँ पे शैख़ अब्दुल क़ादिर ने ईसाइयो के लिये लड़े और उनकी हिफ़ाज़त की और उस समय आज का ही फ्रांस है जिसने उनके मुल्क पे हमला कर उन्हे मुल्क छोड़ने पे मजबूर कर दिया था.......हमने तो तारीख वो मिसाल पेश की है की मेरा दावा है की दुनिया कभी भी ऐसी मिसाल पेश नही कर सकती आज भी सिरिया है और आज भी फ्रांस है और वही फ्रांस सिरिया मे बम की बारिश कर रहा है जहाँ के लोगो ने ईसाइयो के तहफ्फुज़ के लिये अपनी खून की दरिया बहा दिये और आज.......
We have presented to history an example where we protected those in their bad times who had done graet harm to us....Today the same people (the French) are shedding our blood in the same location - Syria.

अफ़सोस कोई शैख़ अब्दुल क़ादिर(रह.) की मिसाल पेश न कर सका.....आज जब अपने चंद शहरियो की मौत पे सिरिया मे मासूम बच्चो के उपर बम की बारिश कर दी जाती हो और हमसे शांति की मिसाले माँगी जाती हो तो ऐसे समय मे शैख़ अब्दुल क़ादिर की मिसाल पूरे दुनिया के सिर्फ़ चेहरे ही नही बल्कि ज़हन पे तमाचा है और उनकी जैइस मिसाल न पेश करने का जुर्म भी

sadly no one could replicate what Shaikh Abdul Qadir RA did and today we only witness the dead bodies of the children killed in bombings in Syria.

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#3 [Permalink] Posted on 12th October 2017 09:41
Maulana Hasan Jan


This is not focussed on a personality but it gives an excellent perspective on recent turn of events from a point of view that takes Muslim sensitivities into account.

अफगानिस्तान में स्वेत यूनियन का हमला जिसे तारीख़ में अफगान जिहाद के नाम से याद किया जाता है और उस जंग में शामिल लोगों के लिये
मुजाहिदीन लफ्ज़ की इस्तेलाह मुस्लमानल मोअर्रिखीन(Muslim Historian),दानीश्वरो,सहाफियो(Journalists) व उलमा के अलावा मगरिबी दानिश्वर बल्कि मग़रिबी सियासी लीडरान भी इस्तेमाल करते है की तारीख़(History) में मुझे हमेशा एक तालिब-ए-इल्म(Student) की हैसियत से दिलचस्पी रही और इस दिलचस्पी की वजह थी कि मैंने उस जंग की तारीख़ के अलावा उस वक़्त के सियासी,समाजी,मज़हबी व नफसियाती तजज़ियो को मुख़्तलिफ़ मैगज़ीन व अखबारात जो किताबी शक़्ल में मख़्सूस रिपोर्ट की तर्ज़ पर शाया हुये हो को उस जंग के सबसे अहम फरीक इस्लामिस्ट व सेक्युलर व एथिस्ट के नुक्त-ए-नज़र से पढ़ा है और आप बखूबी जानते होंगे कि दौरान-ए-जंग दोनो नज़रियों में एक दूसरे के रद्द की कितनी शिद्दत होती होगी लेकिन आपको हैरानी होगी कि इस जंग में मुसलमानो का जो इल्मी ज़र्ब था स्वेत यूनियन व उससे मोतअस्सिर हज़रात पर उस ज़र्ब का इल्मी जवाज़ उन उलमा ने पेश किया था जिन्हें आमतौर पर एतेदालपसन्द समझा जाता था और उन इल्मी तहरीरों व तक़रीरों को अवाम तक उन उलमा व दानीश्वरो ने पहुंचाया जो इंतेहापसन्द समझे जाते थे हुआ यूँ की जब अफगान जिहाद खत्म हुआ और स्वेत यूनियन टुकड़े टुकड़े बंट गया ठीक उसी वक़्त अफगानिस्तान की ज़मीन पर ताक़त के होसुल की जंग शुरू हुई वही साथ मे इल्मी हलको में एक और जंग का आगाज़ हुआ और ये जंग किसी बाहरी दुनिया से नही बल्कि उन उलमा व दानीश्वरो में थी जो इस जंग में शरीक थे ये जंग इल्म की जंग थी और जब उस वक़्त शाया होने वाली किताबे उठाएंगे तो इस जंग की छाप आपको जरूर दिखेगी
इस इल्मी जंग के बहुत से जुज़्यात है आप और इसपे बात करने के लिये अलग से एक लंबी तहरीर की दरकरार होगी इसलिए मैं उस बहस में नही जाता बस एक बात क्लियर कर दु की वो जंग हर मामले व मसाएल में एतेदाल व इंतेहापसंदी की थी और इस जंग में मैंने देखा कि की अक्सर वो उलमा व दानिश्वर एतेदालपसन्द रुख पर थे जिनका माज़ी उनके मुस्तनद होने की दलील देता हो और उनका नाम एक इल्मी शख्सियत की हैसियत से लिया जाता हो जबकि जो मोतशद्दीद गिरोह था उसमें ज़्यादातर नातजर्बेकार व कम इल्मी हैसियत के लोग थे
इस इल्मी जंग का अंजाम ये हुआ कि अक्सर मोतशद्दीद गिरोह के लोग इन एतेदालपसन्द गिरोह के गुमराह होने,ख़ारजी होने के फतवे देने शुरू कर दिया और नाज़ेबा ज़ुबान तो आम ही थी और आखिर में इन सब का नतीजा ये हुआ कि वो एतेदालपसन्द उलमा जिनकी इल्मी तहरीरों को ही बुन्याद बना इन्होंने एक माज़ी की अज़ीम तारीख़ रक़म की थी उन्ही को इन मोतशद्दीद गिरोह के वो नासमझ नौजवान जो उन पूरे हालात में खुद ऐनी शाहिद नही थे उन्होंने इन्हें ही दुश्मन समझ जज़्बात में आकर शहीद करना शुरू कर दिया और उनमे सबसे बड़ी मिसाल मौलाना हसन जान शहीद(रह.) है इसके अलावा एक लंबी लिस्ट है
कहने का मक़सद सिर्फ इतना है कि जब इन्सान चाहे नज़रियाती गिरोह की ही शक्ल में हो जब भी हद से तजावूज़ करेगा भले ही दीन में ही क्यो न हो हमेशा वो उस कौम का नुकसान करेगा जिसके साथ होने का वो दावेदार है और ये बात तारीख़ के अलावा इस्लाम की तालीमात से साबित शुदा है
मेरी इस पूरे मंज़रनामें को बयान करने का मक़सद सिर्फ इतना था कि इस फेसबुक की दुनिया मे कुछ इस्लामपसन्द लोग भी है और हमेशा मैंने इन्हें मुत्तहिद पाया लेकिन अब देख रहा हूँ कि अफगानिस्तान जंग के बाद बड़े लोगो की एक बड़े पर्दे पे बड़ी इल्मी जंग लड़ी गयी जिसका नतीजा बहुत अफसोसनाक हुआ वही जंग इस छोटी दुनिया मे छोटे लोगो कद ज़रिये छोटे पर्दे पे कम इल्मी व जज़्बातीयत की जंग हो रही है उसमे और इसमें एक बात कॉमन है कि दोनों तबके उसी तबके के नज़रियाती वारिस है भले उन्हें इस तारीख़ का इदराक न हो
एक बात यहाँ वाज़े कर दु की यहाँ बहुत से ऐसे लोग जो जिहालत की इंतहा पर है इस्लामप्रस्ती का चोगा शोहरत हासिल करने के लिये पहने हुये है और यही वो लोग है जो उलमा को काफिर व मुल्हिद के फतवे दे रहे है वरना हक़ीक़त ये है कि इस फेसबुक की दुनिया मे लोगो को इस्लामिक नज़रिये की तरफ ध्यान दिलाने में वो लोग बराबर शरीक है जिनके खिलाफ ये बेवकूफ नाज़ेबा ज़ुबान इस्तेमाल कर रहे है इसलिए वक़्त की ज़रूरत है कि फौरन वो लोग जो मोतशद्दीद ख्यालात के हैं उनसे अलग हो और कम से कम एक दूसरे एहतेराम करे भले ही ज़ाविया-ए-नज़र मुख़्तलिफ़ हो लेकिन मक़सद सभी का एक है

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#4 [Permalink] Posted on 12th October 2017 09:45
Alija Izetbegović


Mubashshir Ahsan Al-Azizi

मग़रिबी दुनिया(Western World) मौजूदा दुनिया मे अपने मोहज़्ज़ब(Civilized)होने की सबसे बड़ी दावेदार है और इस दावेदारी के लिये वो इंसानी इक़दार के फ़लाह की खिदमात का तसव्वुर पेश करती हैं जिसमे जम्हूरियत(Democracy) से ले कर जदीद इंसानी होकुक की तारीफ़(Definition of Modern Human Right) और मुख़्तलिफ़ सियासी व इक्तेसादि नज़रियात(Political and Economic Ideology) तक शामिल है यही वजह है कि जब आप किसी मग़रिबी ओरिएंटालिस्ट की किताबो का मुतआला नौआबादयाती दौर(Colonial Period) के हवाले से करेंगे तो पाएंगे कि वो उस दौर में मग़रिबी दुनिया के ज़रिए होने वाले मज़ालिम का दिफ़ा इस जवाज़ के साथ किया जाता है कि “उन्होंने तहज़ीबी इक़दार की तकरक़्क़ी में वो मक़ाम हासिल कर लिया है कि अब क़ुदरत ने खुद उन्हें ये ज़िम्मेदारी सौंप दी हैं कि वो गैरमोहज़्ज़ब अक़वाम को न सिर्फ तालीम दे बल्कि अपने तहज़ीबी ढांचे में शामिल करने के लिये हर वो तदबीरे अपनाये जो इन्हें ‘तरक़्क़ी और मोहज़्ज़ब’ दुनिया मे दाखिल कर सके”
मग़रिबी दुनिया की तारीख इंसानियत के लिये न सिर्फ तारीक़ है बल्कि एक दर्दनाक बाब की मानिंद है उसकी मिसाले अमेरिका के 3 करोड़ रेड इंडियन के कत्ल से लेकर अफ़्रीका के अल्जीरिया में 3 मिलियन लोगो के कत्ल-ए-आम से होते हुये भारत और ऑस्ट्रेलिया तक दुनिया के हर खित्ते पर वहिशाना दरिंदगी तारीख़ के अवराक पर नक़्श है और जब नौआबादयाती दौर खत्म हुआ तो इन्होंने अपने तसव्वुरात इन पर थोपने के लिये बमुक़ाबिल नौआबादयाती दौर के कुछ बेहतर तरकीबे खोजी और उसका जाल कही जम्हूरियत और कही डिक्टेटर कम्युनिस्म के तौर पर बुना और उनका ये दावा की वो एक मोहज़्ज़ब कौम है के लिये ये एक मिसाली सबूत के तौर पर उभरा लेकिन इस दावे की नीयत पर अहले इल्म को तब शक में मुब्तिला किया जब अल्जीरिया में तख़्तापलट किया गया लेकिन अब मिस्र में अल सीसी के ज़रिए तख़्तापलट के बाद शिद्दत से उस दावे की नीयत पर सवाल उठाये जा रहे है लेकिन मगरिबी दुनिया का सबसे बड़ा दावा जो बहैसियत एक मोहज़्ज़ब कौम के था कि इंसानी जान के इक्दार की पासदारी उनके कौमी अख़लाक़ी आइन का सबसे अहम जुज़ है और मेआर-ए-मोहज़्ज़ब के उन्होंने मज़हबी,नस्ली और वतनी जोनूनीयत से छुटकारा हासिल कर लिया इस दावे का खोखलापन आज के 22 साल पहले बोस्निया में बिल्कुल खुल कर वाज़े हो गया था जब चंद घंटों में हज़ारो मुस्लिम औरतो,बच्चो,बुढो व नौजवानों का कत्ल सिर्फ उनके मज़हब और नस्ल की बुनियाद पर कर दिया गया और आज भी मोतअस्सीब मग़रिबी मोसन्नेफीन अफगानिस्तान और इराक़ के हमले का बेशर्मी से जवाज़ तो ढूंढ लाते है लेकिन बोस्निया के कत्ल-ए-आम का जवाज़ उनकी किताबे देने से क़ासिर है
बोस्निया के पहले सदर(President) Alija Izetbegović जो कि एक इस्लामिक स्कॉलर,दानिश्वर,मोफक्किर व मुजाहिद थे पिछले साल उनकी एक किताब ‘Islam Between East and West पढ़ी थी वैसे तो ये किताब 1980 में पब्लिस हुयी थी इसलिए इसमें बोस्नियन क़त्ल-ए-आम के वाक़्यात दर्ज नही लेकिन इसमें उन्होंने मग़रिबी दुनिया के हर इल्मी दावे को न सिर्फ चैलेंज किया था बल्कि उस वक़्त मग़रिबी नफसियाती हालात को भी इशारतन वाज़े किया था जो आपको बोस्नियन कत्ल-ए-आम को समझने में मदद करेगी साथ मे कम्युनिस्टो की कारगुजारिया भी आपको बखूबी मिलेंगी उन्ही के अल्फ़ाज़ में उनकी जद्दोजहद का तआरुफ कुछ यूँ है कि ‘मैं एक बोस्नियन मुसलमान हूँ और लंबे वक़्त से इस मुल्हिद मआशरे में इस्लामी नज़रिये की हिफाज़त में मशरूफ़ व मशगूल हूँ और ये बहुत ही बेहतरीन मौक़ा है कि मैं बोस्नियन मुस्लिम नौजवान नस्ल के दिल-ओ-दिमाग मे एक नये अंदाज़ से इस्लाम का हक़ीक़ी तसव्वुर उजागर कर दूं”

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#5 [Permalink] Posted on 16th October 2017 20:02
It is obvious that this thread is ONLY for those who can read Hindi script. I can only envy those lucky people who knows Hindi.The topic is very interesting though. I feel disappointed by not being able to benefit from it.
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#6 [Permalink] Posted on 16th October 2017 21:52
ALIF wrote:
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Maripat wrote:
I intend to do the English summary later on.
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#7 [Permalink] Posted on 16th October 2017 21:55
As we are waiting for translations the following audios might be a useful introduction.

Shaykh Abdul Qadir Al Jazairi (rah)

By Shaykh Hamza Yusuf .... youtu.be/jwV6fvo2ObI 4.27 Minutes.

Alija Izetbegovic a documentary of his life by Ilm Films channel youtu.be/AOozTs-UKL8 38 Minutes.
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#8 [Permalink] Posted on 17th October 2017 06:02
ALIF wrote:
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My apologies for not keeping the promise as of yet.
I invest lots of energy in these things yet the amount of work is really too much to keep up with.

In the meanwhile may I be allowed to say a few things on this issue of Hindi.

When India lost to the British in 1857 it became clear that the defeat was only temporary and the British were destined to go.

One must be amazed at the farsightedness of some of the people in the majority community in India - they wasted no energy on sending the English back to Britain. Instead they got themselves busy in planning the shape of things India as they would stand after the British Raj.

Among the countless thins they turned to was Hindi. The wider narrative concerned Hindi-Hindu-Hindustan.

This entailed shunting out Arabic, Persian and even Urdu. In their magnanimity they only urged and knudged for only one small sacrifice on part of Urdu users. Change the script from Perso-Arabic to Devnagari - the script you see above.

That is when began this tedious journey of Muslims to protect their heritage and their identity.

Today very few Muslims get the opportunity to study Urdu. I, for one, did not get. Though I read, write and speak Urdu but it is all self-effort and it has all the faults of do-it-yourself type of things.

What about others? Well mostly they hardly care. Hardly any Muslim is ashamed of not knowing this languge. Most argue vociferously in favour of Hindi.

In view of it some brothers have made the compromise that they write Urdu in Devnagari. that is what you see above. It is not Hindi. It is actually Urdu written in Hindi script - Devnagari.

Anyway the info in the video links posted by brother abu Mohammed will have more content then above posts that some concerned Muslim youth are disseminating on FB.

I can use Hindi myself and that too at a very high level. many times I get this urge to write purely Islamic posts in pure Hindi.

This does not mean that I am nonchallant about the fate of Urdu. I love it and I am committed to it.

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#9 [Permalink] Posted on 18th October 2017 20:12
Maripat wrote:
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I understand this phenomenon or at least I think I do...

When the intention is to completely or partially disconnect a nation from its past,its history,its culture and its Hero,s..all that is required is to change the script of its language.This was done by Mustafa Kamal in Turkey and is done by the majority in India.

From their point of view they did the right thing,all in their national interest. For Muslims,it was not so good.As you rightly pointed out few would take the hard path to learn Urdu,Arabic or Persian script.One or two more generations and Urdu script would be a thing of past,limited to a few research scholars. Sad ground realities !

I hope some institutions take the responsibility to translate the great treasure of Islamic literature,poetry and history from Urdu script to Hindi (Devanagari).Infact,all Muslims anywhere in the world,particularly those residing in Non-Muslim countries,should make it a point to do TWO things : LEARN ARABIC and VISIT MORE FREQUENTLY TO HARAMAIN SHARIFAIN to keep in touch with their roots and keep their MUSLIM IDENTITY fresh in their mind. Wallaho Alam
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#10 [Permalink] Posted on 19th October 2017 11:55
I have given a rushed summary type translation of the first post in Hindi above.
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Umm Khadeejah
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#11 [Permalink] Posted on 20th October 2017 08:12
Maripat wrote:
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Bismillah

I cannot translate urdu because many are good in urdu here but as people cannot read the devanagari script I have transliterated the text in English so those who can read English and understand urdu may benefit inshaaAllah.

Alija Izetbegović
Mubashshir Ahsan Al-Azizi
Maghribi duniya (Western world) maujooda duniya me apne mohajjab (civilized) hone ki sabse badi daawedaar hai aur is daawedaari ke liye woh insaani iqdaar ke falaah ki khidmat ka tasawwur pesh karti hai jisme jamhuriyat (democracy) se lekar jadeed insaani hokook ki taareef aur mukhtalif siyaasi wa iktesaadi najriyaat (political and economic ideology) tak shaamil hai yahi wajah hai ki jab aap kisi maghribi orientalist ki kitaabon ka mutaalaa nau’aapaadyaathi daur (colonial period) ke hawaale se karenge to paayenge ki woh us daur mein maghribi duniya ke jariye honewaale majaalim ka difaa is jawaaj ke saath kiyaa jaata hai ki “unhone tahjeebi iqdaar ki takrakki mein woh maqaam haasil kar liyaa hai ki ab qudrat ne khud unhein ye zimmedaari saunp di hai ki woh ghair mohajjab aqwaam ko na sirf taalim de balke apne tehjeebi d’haanche mein shaamil karne ke liye har woh tadbeere apnaaye jo inein “tarakki aur mohajjab” duniyaa me daakhil kar sake”

Maghribi duniyaa ki taareekh insaaniyat ke liye na sirf taareeq hai balke aik dardnaak baab ki maanind hai uski misaale America ke 3 karod red Indians ke qatl se lekar Africa ke Algeria mein 3 million logon ke qatl-e-aam se hote hue Bhaarat aur Australia tak duniya ke har khitte par wahishaana darindhagi taareekh ke awraak par naqsh hai aur jab nau’aabaadyaathi daur khatm huaa to inhone apne tasawwuraat in par thopne ke liye bamukaabil nau’aabaadyaathi daur ke kuch behtar tarkeebe khoji aur uska jaal kahi jamhooriyat aur kahi Dictator communism ke thaur par bunaa aur unka ye daawaa ki woh aik mohajjab qaum hi ke liye ye aik misaali sabot ke thaur par ubhra lekin is daawe ki niyyat par Ahle ilm ko tab shak mein mubtilaa kiyaa jab Algeria mein takhtaapalat kiyaa gaya lekin ab Misr mein al seesee ke jariye takhtaapalat ke baad shiddat se us daawe ki niyyat par sawaal utaaye jaa rahe hain lekin maghribi duniyaa ka sabse badaa daawaa jo bahaisiyat aik mohajjab qaum ke thaa ki insaani jaan ke ikdaar ki paasaadaari unke qaumi akhlaaqi aa’in ka sabse aham jooz hai aur me’aar-e-mohjjab ke unhone majhabi, nasli aur watani jonooniyat se chutkaara haasil kar liya is daawe ka khokhlaapan aaj ke 22 saal pehle Bosnia mein bilkul khul kar waaje ho gaya tha jab chand ghanton mein hazaaron Muslim auraton, bachchon, boodon wa naujawaanaon ka qatl sirf unke mahjab aur nasl ki bunyaad par kar diya gaya aur aaj bhi mothasseeb maghreebi mosannefeen Afghanista aur Iraq ke hamle ka besharmi se jawaaz to doond laate hain lekin Bosnia ka qatl-e-aam ka jawaaj unki kitaabein dene se qaasir hai.

Bosnia ke pehle sadar (President) Alija Izetbegovic jo ki aik Islamic scholar, daanishwar, mohakkir wa mujaahid the pichle saal unki aik kitaab “Islam between East and West” padi thi waise to ye kitaab 1980 mein publish hui thi isliye ismein Bosnia qatl-e-aam ke waaqyaat darj nahi lekin isme unhone maghribi duniya ke har ilmi daawe ko na sirf challenge kiya tha balke us waqt maghribi nafsiyaati haalaat ko bhi ishaaratan waaje kiya tha jo aapko Bosnian qatl-e-aam ko samajhne mein madad karega saath me communiston ki kaargujaariyaa bhi aapko bakhoobi milengi unhi ke alfaaz mein unki jadyojahad ka ta’aaruf kuch yun hai ki “main aik Bosnian musalmaan hun aur lambe waqt se is mulhid ma’aashare mein Islaami nazriye ki hifaazat mein mashruf wamashgool hun aur ye bahot hi behtareen mauqaa hai ki main Bosnian Muslim naujawaan nasl ke dil-o-dimaagh me aik naye andaaz se Islam ka haqeeqi tasawwur ujaaghar kardun”

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#12 [Permalink] Posted on 20th October 2017 09:48
Umm Khadeejah wrote:
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JazakAllah khairan...
Very useful inshaAllah
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#13 [Permalink] Posted on 20th October 2017 10:07
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#14 [Permalink] Posted on 20th October 2017 12:07
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#15 [Permalink] Posted on 20th October 2017 15:10
Jazakallah sister Umm Khadeejah for the transliteration, it helps, and Khan Sahab for the links.
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